जगदलपुर.
बस्तर दशहरा सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि गांवों और परंपराओं से जुड़ी जिम्मेदारियों का जीवंत उदाहरण है. 75 दिनों तक चलने वाले इस ऐतिहासिक पर्व की पहली रस्म के लिए बिलोरी गांव के ग्रामीणों ने अपनी जिम्मेदारी निभाई.
ग्रामीण माचकोट के जंगल से साल की लकड़ी लेकर मां दंतेश्वरी मंदिर पहुंचे. इसी लकड़ी से दशहरा रथ निर्माण में इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक औजार तैयार किए जाएंगे. खास बात यह है कि लकड़ी का चयन भी आधुनिक तरीके से नहीं, बल्कि वर्षों पुरानी परंपरा से किया गया. ग्रामीणों ने पहले साल के पेड़ का चयन किया और फिर पूजा-पाठ के बाद उसे काटा. परंपरा के मुताबिक वही पेड़ चुना जाता है जिसे ग्रामीण अपने हाथों से घेर सकें. इसके बाद करीब चार फीट मोटाई का ठुरलु खोटला तैयार किया गया. अब यह लकड़ी मां दंतेश्वरी मंदिर के सामने पहुंच चुकी है.
हरियाली अमावस्या के दिन मांझी-चालकी, पुजारी और ग्रामीणों की मौजूदगी में पाटजात्रा पूजा विधान होगा. यानी दशहरा शुरू होने से पहले ही बस्तर के गांव अपनी भूमिका निभाना शुरू कर चुके हैं. सदियों पुरानी यह व्यवस्था आज भी उसी श्रद्धा और जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ रही है. यही परंपरा बस्तर दशहरा को देश के दूसरे पर्वों से अलग पहचान देती है.









