बिलासपुर
जल संरक्षण आज के समय की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। प्रस्तुत लेख इसी विषय पर आधारित एक प्रेरणादायक कहानी “गोलू और पानी की बूँद ” को दर्शाता है।
गोलू कक्षा पाँचवीं में पढ़ता था। उसे नल खोलकर ब्रश करना और बाल्टी भर-भरकर पौधों में पानी डालना बहुत अच्छा लगता था।
एक दिन स्कूल से आकर उसने देखा कि घर के बाहर नल खुला है और पानी बेकार बह रहा है। उसने सोचा, "थोड़े से पानी से क्या होगा?" और अंदर चला गया
रात को गोलू को एक सपना आया। एक छोटी सी पानी की बूँद रो रही थी। गोलू ने पूछा, "तुम क्यों रो रही हो?"बूँद बोली, "गोलू, मैं धरती की आखिरी बूँद हूँ। सब लोग मुझे बर्बाद कर रहे हैं। अगर मैं भी खत्म हो गई तो पेड़-पौधे सूख जाएँगे, जानवर प्यासे मर जाएँगे और तुम्हें पीने को पानी नहीं मिलेगा। धरती बंजर हो जाएगी।"गोलू डरकर उठ गया। सुबह होते ही वह दौड़कर बाहर गया और नल को कसकर बंद कर दिया।उस दिन से गोलू बदल गया। वह मग से ब्रश करता, नहाने के लिए बाल्टी का इस्तेमाल करता और मम्मी को भी आरोह का बचा हुआ पानी पौधों में डालने को कहता। स्कूल में उसने दोस्तों को भी समझाया।धीरे-धीरे पूरी सोसाइटी ने पानी बचाना शुरू कर दिया। बारिश का पानी इकट्ठा करके बगीचे में लगाने लगे।
कुछ महीनों बाद गोलू की सोसाइटी सबसे हरी-भरी दिखती थी क्योंकि सबने पानी की कीमत समझ ली थी।









