नई दिल्ली
रणजी ट्रॉफी में 400 रन का रिकॉर्ड स्कोर बनाने वाले चिन्मय सुथार ने खुलासा किया है कि उन्होंने मजबूरी में मिजोरम के लिए खेलने का फैसला किया था। हालांकि, उनके लिए यह फैसला वरदान साबित हुआ और 400 रन बनाकर वह पूरे क्रिकेट जगत में चर्चा का विषय बन गए। चिन्मय मुंबई से आते हैं, लेकिन यहां स्टार खिलाड़ियों की भरमार के कारण उन्हें पर्याप्त मौके नहीं मिल रहे थे। इसी वजह से उन्होंने मिजोरम के लिए खेलने का फैसला किया और इतिहास रच दिया। चिन्मय ने रणजी ट्रॉफी में नागालैंड के खिलाफ नाबाद 400 रन की ऐतिहासिक पारी खेली। वह रणजी ट्रॉफी के इतिहास में एक पारी में 400 रन बनाने वाले दूसरे बल्लेबाज बन गए हैं।
29 साल के चिन्मय ने अपनी पारी के दौरान 517 गेंदों का सामना किया और 46 चौके तथा 7 छक्के लगाए। उनकी इस मैराथन पारी की बदौलत मिजोरम ने पहली पारी में 9 विकेट पर 581 रन बनाकर पारी घोषित की।
मुंबई छोड़कर मिजोरम क्यों गए चिन्मय?
चिन्मय मुंबई के घरेलू क्रिकेट सिस्टम से जुड़े रहे हैं। उन्होंने मुंबई के लिए सीमित ओवरों का क्रिकेट खेला, लेकिन उनकी प्राथमिकता रेड-बॉल क्रिकेट में अपनी पहचान बनाना था। उन्हें मुंबई की टीम में इस फॉर्मेट में नियमित अवसर नहीं मिल पा रहे थे। हिंदुस्तान टाइम्स की खबर के अनुसार चिन्मय ने बताया कि वह हमेशा रेड-बॉल क्रिकेट खेलना चाहते थे। पिछले सीजन में वह मुंबई की व्हाइट-बॉल टीम का हिस्सा थे, लेकिन रणजी क्रिकेट में मौके नहीं मिलने के कारण उन्होंने दूसरे विकल्प तलाशने शुरू किए। इसी दौरान उन्हें मिजोरम की ओर से खेलने का अवसर मिला। उन्होंने इस मौके को स्वीकार किया और टीम बदलने का फैसला कर लिया। चिन्मय के लिए यह आसान निर्णय नहीं था, लेकिन वह अपने क्रिकेट करियर को आगे बढ़ाने के लिए जोखिम लेने को तैयार थे।
पहले मैच में शतक से चूके, दूसरे में किया कमाल
मिजोरम की ओर से खेलते हुए उन्होंने अपने पहले रणजी मुकाबले में मणिपुर के खिलाफ दूसरी पारी में 99 रन बनाए थे। वह शतक से सिर्फ एक रन दूर रह गए थे। इसके बाद नागालैंड के खिलाफ उन्होंने 400 रन की नाबाद पारी खेलकर उस शतक की कसक भी दूर कर दी। नागालैंड के खिलाफ मुकाबले में चिन्मय ने शुरुआत से ही संभलकर बल्लेबाजी की। उन्होंने विकेट पर समय बिताया और अपनी पारी को आगे बढ़ाया। जब वह 231 रन पर थे, तब मिजोरम का आखिरी विकेट बाकी था। नंबर-11 के बल्लेबाज लालरेम्पुइया छकछुआक के क्रीज पर आने के बाद चिन्मय ने पारी को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी संभाली। दोनों बल्लेबाजों ने दसवें विकेट के लिए नाबाद 189 रन की साझेदारी की। इस साझेदारी में चिन्मय के बल्ले से 169 रन निकले।
10वें विकेट की साझेदारी ने पलटा मैच
आखिरी विकेट के लिए हुई साझेदारी ने मैच का रुख बदल दिया। चिन्मय ने व्यक्तिगत रिकॉर्ड के बजाय टीम के स्कोर पर ध्यान देने की बात कही। उन्होंने बताया कि दोनों बल्लेबाजों के बीच बातचीत इस बात पर होती थी कि टीम के लिए 20-30 रन और कैसे जोड़े जाएं। आखिरकार चिन्मय ने 400 रन का आंकड़ा पार किया और मिजोरम ने 581/9 के स्कोर पर पारी घोषित कर दी।
रणजी ट्रॉफी में 400 रन बनाने वाले दूसरे बल्लेबाज
चिन्मय से पहले रणजी ट्रॉफी में एक पारी में 400 रन बनाने का कारनामा बीबी निंबालकर ने किया था। निंबालकर ने 1948-49 के सीजन में महाराष्ट्र की ओर से खेलते हुए काठियावाड़ के खिलाफ नाबाद 443 रन बनाए थे। चिन्मय के 400 रन के बावजूद रणजी ट्रॉफी में सबसे बड़ी व्यक्तिगत पारी का रिकॉर्ड निंबालकर के नाम ही कायम है। चिन्मय ने पृथ्वी शॉ के 379 रन के स्कोर को भी पीछे छोड़ दिया।
टी20 क्रिकेट में भी दिखा चुके हैं दम
चिन्मय सुतार केवल लंबे प्रारूप के बल्लेबाज नहीं हैं। उन्होंने टी20 क्रिकेट में भी अच्छा प्रदर्शन किया है। मुंबई टी20 लीग में वह माराठा रॉयल्स के लिए खेलते हैं और लगातार रन बनाकर अपनी उपयोगिता साबित कर चुके हैं। वह 2025 मुंबई टी20 लीग में ऑरेंज कैप जीतने वाले बल्लेबाज रहे। 2026 के सीजन में भी उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया और टूर्नामेंट के सबसे ज्यादा रन बनाने वाले बल्लेबाज बने। इस दौरान उन्होंने सेमीफाइनल में 49 गेंदों पर 62 रन और फाइनल में 52 गेंदों पर 61 रन की पारियां खेलीं।
पिता भी खेल चुके हैं मुंबई के लिए फर्स्ट क्लास क्रिकेट
चिन्मय सुतार के क्रिकेट सफर में उनके परिवार का भी अहम योगदान रहा है। उनके पिता राजेश सुतार मुंबई के लिए फर्स्ट क्लास क्रिकेट खेल चुके हैं। उन्होंने 7 फर्स्ट क्लास मैच खेले थे और क्रिकेट के अनुभव से बेटे को मार्गदर्शन देते रहे हैं। चिन्मय ने अपनी ऐतिहासिक पारी के बाद सबसे पहले अपने पिता को फोन किया। उन्होंने बताया कि उनके पिता शुरुआती दिनों से ही उनका समर्थन करते रहे हैं और जब उन्हें खेलने के मौके नहीं मिलते थे, तब भी हौसला बनाए रखने की सलाह देते थे।









