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असम चुनाव का रुख CAA और आदिवासियों के मुद्दे करेंगे तय

नई दिल्ली
असम विधानसभा चुनाव की दिशा इस बार काफी हद तक नागरिकता संशोधन कानून और आदिवासियों के रुख पर टिकी है। कांग्रेस ने नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ गमछे इकठ्ठा कर और चाय बगानों में काम करने वालों की न्यूनतम दिहाड़ी बढ़ाने की गारंटी देकर इन मुद्दों को चुनाव के केंद्र में ला दिया है। पार्टी ने चुनाव में जिन पांच गारंटी का वादा किया है, उनमें सीएए को निरस्त करने के लिए नया कानून बनाने का वादा भी शामिल है। नागरिकता संशोधन कानून के पारित होने के बाद असम में यह चुनाव है। राज्य में असमिया बनाम गैर असमिया बड़ा मुद्दा रहा है। सीएए का सबसे पहले विरोध भी असम से शुरू हुआ था। इस मुद्दे के विरोध में असम जातीय परिषद और राइजर दल चुनाव मैदान में हैं। भाजपा जहां इस मुद्दे पर चुप है, वहीं कांग्रेस मुद्दे को उठाने में कोई कोर कसर नहीं रख रही है। ऐसे में साफ है कि सीएए चुनाव का रुख तय करने में अहम साबित होगा।

सीएए का सबसे ज्यादा विरोध ऊपरी असम में हुआ था। पिछले चुनाव में भाजपा को इस क्षेत्र में जबरदस्त कामयाबी मिली थी। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा ने बढ़त बरकरार रखी। सीएए के बाद तस्वीर बदली है। कांग्रेस को उम्मीद है कि वह सीएए को लेकर लोगों की नाराजगी वोट में बदलने में सफल रहेगी। पर इसका एक दूसरा पहलू भी है। असम जातीय परिषद के चुनाव लड़ने से कांग्रेस को झटका लगा है। एआईयूडीएफ से गठबंधन भी नुकसान कर सकता है। कांग्रेस सीएए के साथ असम अकॉर्ड का भी जिक्र कर रही है। पार्टी का कहना है कि वह समझौते के हर सिद्धांत की रक्षा करेगी और इससे बिल्कुल नहीं भटकेगी। यह भरोसा दिलाकर पार्टी ऊपरी असम में सीएए से नाराज मतदाताओं का समर्थन हासिल करना चाहती है। क्योंकि, ऊपरी असम में बांग्लाभाषी बहुसंख्यकों की तादाद अच्छी खासी है। यही वजह है कि पिछले कुछ चुनावों में भाजपा की पकड़ इस क्षेत्र में मजबूत हुई है।

असम में आदिवासी वर्षों से चाय बगानों में काम करते आ रहे हैं। सीएए के साथ उनके सामने कई और चुनौतियां भी हैं। इनमें सबसे बड़ी मुश्किल मजदूरी है। आदिवासी अमूमन क्षेत्रीय पार्टियों को वोट करते रहे हैं, पर पिछले चुनाव में छिटककर भाजपा की तरफ चला गया था। चाय बगानों में काम करने वाले आदिवासी मजदूर लंबे समय से दिहाड़ी बढाने की मांग करते रहे हैं। इन समुदायों का भरोसा जीतने के लिए कांग्रेस ने 365 रुपए प्रतिदिन मजदूरी की गारंटी दी है। लिहाजा, चुनाव में सीएए और आदिवासी अहम मुद्दा रहेंगे। निचले असम में मौलाना बदरुद्दीन अजमल की पार्टी एआईयूडीएफ की अच्छी पकड़ है। इस क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं की तादाद भी अच्छी खासी है। ऐसे में कांग्रेस को उम्मीद है कि वोट का बंटवारा नहीं होने की वजह से गठबंधन अच्छा प्रदर्शन करेगा। सीएए इस क्षेत्र में भी बड़ा मुद्दा है। चुनाव में कांग्रेस की अगुआई वाले गठबंधन को इसका फायदा मिल सकता है।

कांग्रेस को एआईयूडीएफ के साथ गठबंधन से ऊपरी असम और बराक घाटी में नुकसान उठाना पड़ सकता है। यही वजह है कि ऊपरी असम के कई कांग्रेस नेता इस गठबंधन के खिलाफ थे। ऊपरी असम में असमिया भाषी लोगों की सीएए विरोधी भावनाओं के चलते भाजपा से कांग्रेस में आने की संभावना थी। पर यूआईडीएफ से गठबंधन की वजह से यह वोट क्षेत्रीय पार्टियों को मिल सकता है। असम चुनाव में सत्तारुढ़ भाजपा और कांग्रेस दोनों गठबंधन में चुनाव लड़ रहे है। भाजपा की अगुआई वाले गठबंधन में असम गण परिषद और यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल शामिल है। वहीं, कांग्रेस की अगुआई वाले चुनावी गठबंधन में एआईयूडीएफ, वामदल और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट शामिल हैं।