इंदौर

मेट्रोपॉलिटन सिटी के नाम पर बज रहे नगर निगम चुनाव के नगाडे

देवास
पिछले तीन दशकों से देवास की राजनीति को देखा जाए तो प्रत्येक चुनाव की आहट के साथ कोई न कोई मुद्दा गर्माता रहा है।  लगभग दो दशक पूर्व तक हर चुनाव में राजनैतिक दलों के लिए जलसंकट का मुद्दा वोट बटोरने का जरिया था। बीते वर्षों में लोकसभा चुनाव के दौरान सीवरेज, रेलवे फाटक पर ओवर ब्रिज निर्माण तो विधानसभा चुनाव में देवास से विजयागंज मंडी तक सड़क निर्माण का विषय छाया रहता था।   फिलहाल  मेट्रोपालिटन सिटी अथवा महानगरीय शहर के नाम पर आगामी नगर निगम चुनाव के नगाडेÞ जोर जोर से बज रहे हैं, और इसकी गूंज सम्पूर्ण मालवांचल में सुनाई दे रही है। दरअसल पिछले दिवस नगरीय विकास मंत्री भूपेन्द्रसिंह इन्दौर के मास्टर प्लान पर समीक्षा बैठक लेने आए थे।

इस बैठक में इंदौर के सांसद  शंकर लालवानी ने कहा कि नया मास्टर प्लान 2035 के हिसाब से बनना चाहिए, उनके साथ अन्य जनप्रतिनिधियों ने यह भी कहा कि शहर को महानगर का दर्जा मिलने के बाद देवास, महू, देपालपुर, सांवेर जैसे शहर की सीमा के आस-पास के इलाकों को भी प्लानिंग एरिया में शामिल किया जाए। सांसद ललवानी का कहना था कि देवास, महू, देपालपुर, सांवेर जैसे शहर की सीमा के आस-पास के इलाके…, लेकिन देवास में हल्ला मच गया कि देवास को इंदौर मेट्रोपालिटन सिटी में शामिल कर उपनगर बनाया जाए, सांसद ललवानी ने यह कहा। मीडिया की सुर्खियां बनने के बाद जनप्रतिनिधियों के बीच सवाल-जवाब, आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल पड़ा।

कांग्रेस के नेता इस मुद्दे पर शहर के विकास का हवाला दे रहे हैं तो भाजपा नेता निगम चुनाव से पूर्व भ्रम फैलाने का आरोप लगा रहे हैं।  इसके पश्चात ललवानी का एक वीडियो भी वायरल हुआ, जिसमे वे यह कहते सुनाई दिए कि उन्होंने देवास की प्लानिंग के बारे में कुछ नहीं कहा।  हालांकि शहर की आम जनता समझ नहीं पा रही है कि यह मेट्रोपालिटन सिटी का माजरा क्या है। वह तो इसे आगामी नगर निगम चुनाव से पूर्व का राजनैतिक शोर ही मान रही है…।

नगर निगम परिषद महानगर क्षेत्र परिषद हो जाएगी। इसकी स्वायत्ता बड़ जाएगी। नगर निगम परिषद के पास निर्णय का अधिकार होगा। शासन पर निर्भर नहीं रहना पडेÞगा। केन्द्र व राज्य सरकारों से अधिक वित्तीय सहायता मिलेगी। योजना समिति में परिषद के निर्वाचित सदस्य शामिल होंगे। महानगर में  शिक्षा, स्वास्थ्य के बेहतर-उच्च प्रबंध होंगे। व्यापार, उद्योग, रोजगार के अवसर बढेÞंगे। वाटर सप्लाय, सीवरेज, ठोस कचरा प्रबंधन, स्टार्म वाटर लाईन, लोक परिवहन, स्ट्रीट लाईटिंग, ट्रेफिक सपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर का लाभ मिलेगा। महानगरों में गांवों की तुलना में जातिवाद और धार्मिक कट्टरता, रूढ़िवादिता कम पाई जाती है।

महानगरीय जनजीवन  जटिलताओं से भरा हुआ है।  बढ़ी हुई आबादी सभी प्रकार की समस्याओं की जन्मदाता कही जा सकती है।  कम आयवालों का जीवन-स्तर निम्न से निम्नतर हो जाता है, जिन्हें महानगर की गंदी बस्तियों में शरण लेनी पड़ती है, जहां, मूलभूत सुविधाओं का सर्वथा अभाव होता है। रोजी रोटी के चक्कर में हर कोई महानगरों की और दौड़ता है, जिससे महानगर में गंदी बस्तियों का फैलाव तेजी से बढ़ता है। महानगर की गंदगी को अत्यधिक बढ़ा देता है,  जिससे बीमारियां फैलने का खतरा यहां हमेशा बना रहता है।  सड़कों पर वाहनों की भरमार, धूल-धुएं का गुबार वायु प्रदूषण तथा ध्वनि प्रदूषण बढ़ा देता है। जिसका प्रभाव जनजीवन पर पढ़ना स्वाभाविक है। वायु प्रदूषण शारीरिक स्वास्थ्य तो ध्वनि प्रदूषण शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों तरह की क्षति पंहुचाता है।  तनाव मस्तिष्क को हर समय अशांत दशा में रखता है। इसके अलावा असमय बहरापन, अनियमित रक्तचाप  हृदय रोग आदि कई लक्षण ध्वनि प्रदूषण के कारण हो सकते हैं।  यहां आम व्यक्ति की निजी पहचान खो जाती है। महानगरों में आधुनिक सुविधाएं तो प्राप्त होती हैं, लेकिन जीवन में सदा ही अतृप्ति का भाव बना रहता है। भौतिक चकाचौंध में व्यक्ति के जनजीवन में नैसर्गिक सुखों का प्राय: अभाव रहता है। गांवों अथवा छोटे शहरों में मिलने वाले प्रकृति प्रदत्त सुख से महानगरवासी वंचित रहते हैं।  गांव के किसी तालाब में नहाने की तुलना तरणताल के नीले पानी में नहाने से नहीं की जा सकती।

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