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जिला विकास परिषद (डीडीसी) के चुनाव, DDC चुनाव में भाजपा और गुपकर गठबंधन के बीच टक्कर

 नई दिल्ली 
केंद्र शासित प्रदेश बने जम्मू-कश्मीर में 28 नवंबर से 19 दिसंबर तक जिला विकास परिषद (डीडीसी) के चुनाव होने हैं। पिछले साल पांच अगस्त को अनुच्छेद 370 निरस्त किए जाने के बाद डीडीसी चुनाव जम्मू और कश्मीर में आयोजित सबसे बड़ी राजनीतिक गतिविधि होगी। केंद्र सरकार का कहना है कि इन चुनावों के जरिए जनता सीधे अपने स्थानीय निकाय के लिए प्रतिनिधि चुनेगी। वहीं, सालभर से ज्यादा समय तक नजरबंद रहे क्षेत्रीय दलों के नेता इन चुनावों के जरिए राज्य में अपने अस्तित्व के लिए एक चुनौती मान रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाते हुए उपराज्यपाल को बताया है कि गैर भाजपा दलों को यहां चुनाव प्रचार नहीं करने दिया जा रहा है।

अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने से पहले जम्मू और कश्मीर में त्रिस्तरीय पंचायत प्रणाली (ग्राम स्तरीय, ब्लॉक स्तरीय, जिला स्तरीय) नहीं थी। बीती 17 अक्तूबर को केंद्र सरकार द्वारा जम्मू और कश्मीर पंचायती राज अधिनियम, 1989 में संशोधन को स्वीकृति देने के बाद नया निकाय डीडीसी जोड़ा गया।

चुनाव कब : 28 नवंबर से 19 दिसंबर तक कुल आठ चरणों में बैलेट पेपर से चुनाव कराया जाएगा। चुनाव का समय सुबह सात बजे से दोपहर दो बजे तक है। 22 दिसंबर को मतगणना होगी।

20 जिलों की डीडीसी के लिए मतदान: इन चुनाव के जरिए जम्मू क्षेत्र के 10 और कश्मीर घाटी के 10 समेत कुल 20 जिलों में डीडीसी का गठन किया जाएगा। हर जिले में 14 निर्वाचन क्षेत्र होंगे, इस तरह पूरे केंद्र शासित प्रदेश में कुल 280 निर्वाचन क्षेत्रों के लिए मतदान के जरिए डीडीसी के प्रतिनिधियों का चयन होगा।

पंचायत की खाली सीटों पर भी वोटिंग : डीडीसी चुनाव के साथ ही केंद्र शासित प्रदेश की 12153 खाली पंचायत सीटों पर भी आठ चरण में चुनाव होंगे। जबकि 28 नवंबर को नगर निकायों की 234 वॉर्डों की खाली सीटों पर चुनाव कराकर उसी दिन परिणाम घोषित किए जाएंगे।

कैसे काम करेगी: हर जिले में एक जिला विकास परिषद (डीडीसी) और एक जिला योजना समिति (डीपीसी) बनायी जाएगी। डीडीसी के सदस्य चेयरमैन और डिप्टी चेयरमैन को चुनेंगे। इस परिषद की जिम्मेदारी जिला योजनाओं और पूंजीगत व्यय को तैयार और अनुमोदित करना होगा।

पहले क्या थी व्यवस्था : पहले जिला योजना व विकास बोर्ड (डीडीबी) था जो तत्कालीन जम्मू-कश्मीर के कैबिनेट मंत्री की अध्यक्षता में काम करता था, उसके सदस्य विधायक और एमएलसी और सदस्य सचिव जिले के उच्चायुक्त होते थे। हालांकि लेह और कारगिल जिलों के लिए स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद काम करती थी।

चुनाव के मायने : जून, 2018 में पीडीपी की सरकार गिरने के बाद से राज्य में विधानसभा चुनाव नहीं हुए हैं। राज्य में लंबे वक्त से एक भी निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं हैं। स्थानीय अधिकारियों का मानना है कि स्थानीय निकाय के चुने हुए प्रतिनिधियों के जरिए इस कमी को पूरा किया जा सकता है।

चुनाव के दौरान सुरक्षा के लिए केंद्रीय पैरामिलिट्री के 25 हजार और जवानों को यहां तैनात किया गया है। वहीं, 165 अतिरिक्त पुलिस फोर्स कंपनियों को भी बाहर से बुलाया गया है। गौरतलब है कि हाल में यहां आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों ने हमला करने की कोशिश की जिसे सेना के जवानों ने विफल कर दिया।

पंचायत चुनाव का किया था बहिष्कार: गौरतलब है कि पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी और नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 2018 में नगर निगम और पंचायत चुनावों का बहिष्कार किया था। तब इनकी बहुत सी सीटें खाली रह गई थीं। फिर पिछले साल 370 हटाने के कुछ ही महीने बाद ही बीडीसी चुनाव कराए गए जिसमें नजरबंदी के कारण बहुत से राजनीतिक दल व नेता भाग ही नहीं ले सके, जिससे पूरी तरह राजनीतिक गतिविधियां बहाल नहीं हुईं।

गुपकर गठबंधन दे रहा भाजपा को चुनौती: डीडीसी चुनावों के लिए जिन राजनीतिक दलों ने हाथ मिलाए हैं, उन्होंने 'गुपकर घोषणापत्र' पर हस्ताक्षर किए थे। पीपल्स अलायंस फॉर गुपकर डिक्लेरेशन (पीएजीडी) का नेतृत्व फारूख अब्दुल्ला कर रहे हैं, इसमें उनकी पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस, महबूबा मुफ्ती की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के अलावा पीपल्स कॉन्फ्रेंस, सीपीआई, सीपीआईएम, अवामी नेशनल कॉन्फ्रेंस और जम्मू और कश्मीर पीपल्स मूवमेंट शामिल हैं। गुपकर से जुड़े दलों का कहना है कि साथ में चुनाव लड़कर वे इस क्षेत्र से सांप्रदायिक ताकतों को अलग रख पाएंगे।

कांग्रेस साथ नहीं: अपने गठन के बाद से ही गुपकर घोषणापत्र से जुड़े दल अनुच्छेद 370 खत्म किए जाने के केंद्र सरकार के फैसले का विरोध कर रहे हैं, इसमें कांग्रेस भी शामिल था। हाल में गृह मंत्री अमित शाह ने इस गठबंधन को गुपकार गैंग कहते हुए कांग्रेस से अपना पक्ष स्पष्ट करने को कहा है। इस पर कांग्रेस के प्रवक्ता ने कहा कि वे गुपकर का हिस्सा नहीं हैं और अकेले चुनाव लड़ेंगे।

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