राजनीति

बिहार की सियासत, यूपी पर भी नजर… कांग्रेस ने कौन सा दांव चला जो रिस्की तो है, मगर फायदेमंद भी हो सकता है

 नई दिल्ली 
बिहार विधानसभा चुनाव का शंखनाद हो चुका है और उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमाने को मैदान में दमखम दिखा रहे हैं। बिहार विधानसभा चुनाव के लिए सभी राजनीतिक दलों ने जातीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए उम्मीदवारों को टिकट दिया है। कांग्रेस ने भी इन समीकरण के साथ तालमेल बनाते हुए अपने उम्मीदवार घोषित किए हैं, पर इसके साथ पार्टी ने अपने परंपरागत वोटबैंक को फिर से हासिल करने के लिए जोखिम भी उठाया है। कांग्रेस के टिकट के बंटवारे पर गौर करने पर ऐसा लगता है कि अब पार्टी अपनी परंपरागत वोट बैंक को मजबूत करना चाहती है। एक तरह से देखा जाए तो भले ही अभी बिहार में चुनाव हो रहे हैं, मगर कांग्रेस की नजर बिहार के साथ-साथ उत्तर प्रदेश पर भी है। 
बिहार विधानसभा चुनाव में राजद की अगुवाई वाले महागठबंधन में कांग्रेस के हिस्से 70 सीटें आईं हैं। इस तरह से कांग्रेस 70 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। इन सभी सीटों पर कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया है। टिकट बंटवारे को देखें तो पार्टी ने सबसे ज्यादा टिकट सवर्ण, उसके बाद दलित और तीसरे नंबर पर मुस्लिम को दिया है। सवर्णों में पार्टी ने 9 ब्राह्मण उम्मीदवार बनाए हैं। जबकि अनुसूचित जाति से 14 और 12 मुस्लिम उम्मीदवार हैं। ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम कांग्रेस को परंपरागत वोट रहा है। चुनाव में पार्टी इन मतदाताओं पर फोकस करेगी।

कांग्रेस ने जिस तरह से बिहार में जातीय समीकरणों और अपने परंपरागत वोट बैंक को हासिल करने के उद्देश्य से उम्मीदवार उतारे हैं, उससे लगता है कि पार्टी अब फ्रंट पर खेलना चाहती है। 12 मुस्लिम और 14 दलित उम्मीदवारों को टिकट देकर कांग्रेस ने अपने इरादे स्पष्ट कर दिए हैं कि उसकी नजर अब बिहार के साथ-साथ यूपी पर भी है। 

दरअस, कांग्रेस बिहार चुनाव के साथ यूपी में भी राजनीतिक संदेश देना चाहती है। जाले विधानसभा सीट से मशकूर अहमद उस्मानी को टिकट देना इसी रणनीति का हिस्सा है। बिहार में उस्मानी को टिकट और यूपी में डॉ कफील खान की रिहाई के लिए मुहिम से साफ है कि पार्टी अब फ्रंट पर खेलना चाहती है, ताकि मुस्लिम मतदाताओं को फिर से भरोसा जीता जा सके। हाथरस मामले में कांग्रेस का अक्रामक रुख रणनीति का हिस्सा है। पार्टी को इस पूरी मुहिम का राजनीतिक लाभ मिलता या नहीं, यह तो वक्त तय करेगा। पर पार्टी यह संदेश देने में सफल रही है कि वह दलितों के मुद्दों को लेकर अक्रामक है। जबकि ऐसे मामलों में बसपा का रुख बहुत अक्रामक नहीं रहा है। समाजवादी पार्टी के हमलों में पहले जैसी धार नहीं थी।

कांग्रेस के अंदर एक बड़ा तबका मौजूदा राजनीतिक हालात में इस तरह के जोखिम लेने के खिलाफ है। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि बिहार में मशकूर अहमद उस्मानी को टिकट देकर भाजपा को मुद्दा दे दिया है। अभी तक प्रचार में स्थानीय मुद्दे हावी थे, पर अब जिन्ना की एंट्री हो गई है। इन नेताओं का मानना है कि पार्टी को इस तरह के निर्णय से परहेज करना चाहिए था।

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