राजनीति

कंगना पर एक्शन से शिवसेना के सहयोगी खुश नहीं, उद्धव से कन्नी क्यों काट लेते हैं सहयोगी दल

 
नई दिल्ली 

शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने विपक्षी दलों मुख्यमंत्रियों की बैठक में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से कहा था कि दीदी हम साथ रहेंगे तो हर आपत्ति डरेगी, हमें फैसला करना चाहिए कि हमें केंद्र सरकार से डरना है या लड़ना है. उद्धव को यह बात कहे हुए महज दो सप्ताह ही गुजरे होंगे और फिल्म अभिनेत्री कंगना रनौत के दफ्तर पर बीएमसी के एक्शन के चलते शिवसेना खुद विवादों में घिर गई है. महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की गठबंधन सरकार में सहयोगी दल कांग्रेस-एनसीपी ने इस विवाद से पल्ला झाड़ लिया है और शिवसेना के साथ खड़े होने को तैयार नहीं हैं.  बता दें कि महाराष्ट्र की सियासत में शिवसेना की पुरानी दोस्त बीजेपी अब उसकी राजनीतिक दुश्मन बन चुकी है और उद्धव ठाकरे सरकार को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ रही है. वहीं, शिवसेना की वैचारिक विरोधी रही कांग्रेस-एनसीपी ही आज उसकी सबसे बड़ी सारथी हैं. महाराष्ट्र की सत्ता संभाले हुए उद्धव ठाकरे को दस महीने होने जा रहे हैं. इन दस महीनों में ऐसे कई मौके आए जब शिवसेना को समर्थन की सबसे ज्यादा दरकरार थी, लेकिन सहयोगी दल हर बार कन्नी काटते नजर आए.

कंगना पर एक्शन से सहयोगी नाखुश 

सुशांत राजपूत की हत्या के बाद से ही बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत और शिवसेना राज्यसभा सांसद संजय राउत के बीच जुबानी जंग जारी है. ऐसे में बुधवार को कंगना रनौत के मुंबई पहुंचने से पहले बीएमसी उनके पॉली हिल्स स्थित उनके ऑफिस जेसीबी लेकर पहुंच गई. अवैध निर्माण के आरोप में बीएमसी ने कंगना के ऑफिस के एक हिस्से को गिरा दिया. बीएमसपी पर शिवसेना का कब्जा है. 

कंगना रनौत पर हुए एक्शन के बाद एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने बीएमसी की कार्रवाई को गैर जरूरी बताया है. पवार ने कहा कि बीएमसी की कार्रवाई ने अनावश्यक रूप से कंगना को बोलने का मौका दे दिया है. मुंबई में कई अन्य अवैध निर्माण हैं. यह देखने की जरूरत है कि अधिकारियों ने यह निर्णय क्यों लिया? पवार ने एक तरह से पूरे मामले में शिवसेना पर ही सवाल खड़े कर दिए. वहीं, कांग्रेस के तमाम बड़े नेता इस पूरे मामले पर खामोशी अख्तियार किए हुए हैं. 

कोरोना की रफ्तार पर कांग्रेस का किनारा 

कंगना रनौत मामले से पहले महाराष्ट्र में कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण के चलते उद्धव ठाकरे अपने पुराने साथी बीजेपी के निशाने पर थी. बिगड़ते हालत को लेकर बीजेपी नेता ने महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग तक कर डाली थी. ऐसे में राहुल गांधी से महाराष्ट्र कोरोना के बढ़ते संक्रमण और राष्ट्रपति शासन की माग पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा था, 'मैं यहां कुछ बातों में अंतर बताना चाहूंगा. हम महाराष्ट्र में सरकार को समर्थन कर रहे हैं. लेकिन महाराष्ट्र में हम लोग फैसले नहीं ले सकते हैं. हम पंजाब, छत्तीसगढ़, राजस्थान और पुडुचेरी में फैसले ले सकते हैं. इसीलिए खुद की सरकार चलाने में और किसी सरकार को समर्थन देने में काफी अंतर होता है.' राहुल साफ तौर पर कन्नी काटते नजर आए थे. 

शिवसेना और कांग्रेस की राजनीति में फर्क है

महाराष्ट्र के वरिष्ठ पत्रकार अनुराग चतुर्वेदी कहते हैं कि शिवसेना का राजनीति करने का जो तरीका है, उससे चलते अक्सर सहयोगी साथ खड़े होने में कतराते हैं. इसके अलावा सबसे बड़ी वजह यह है कि शिवसेना का राजनीतिक दायरा महाराष्ट्र तक ही सीमित है जबकि कांग्रेस राष्ट्रीय पार्टी है. शिवसेना महाराष्ट्र में अपने सियासी हित को देखते हुए फैसले लेती है, लेकिन यह जरूरी नहीं है कि वो कांग्रेस को भी सूट करे. कांग्रेस को महाराष्ट्र में ही सियासत नहीं करनी है बल्कि देश के तमाम राज्यों के राजनीतिक हित को भी देखना है. 

वह कहते हैं कि इसी वजह से कई ऐसे मामले आए जब कांग्रेस ने अपने आपको को शिवसेना से अलग दिखाने की कोशिश की है. कंगना रनौत और कोरोना ही नहीं बल्कि राममंदिर और सीएए मामले पर भी कांग्रेस ने शिवसेना से अलग अपना राजनीतिक स्टैंड रखा था. शिवसेना लंबे समय से हार्डकोर हिंदुत्व की राजनीति करती आ रही है और कांग्रेस धर्मनिरपेक्षता की बात करती है. शिवसेना और कांग्रेस की राजनीतिक धाराएं अलग-अलग हैं और ऐसे में कई मुद्दों पर सामांजस्य बैठना मुश्किल है, जो समय-समय पर साफ नजर आता है.  

उद्धव का एकजुटता का नारा भी काम नहीं आया

यही वजह रही कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने सोनिया की बैठक में कहा था कि गैर भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को जोरदार तरीके से अपनी आवाज उठानी चाहिए, क्योंकि केंद्र सरकार हमारी आवाज को दबाने का प्रयास कर रही है. आम आदमी की तीकत सबसे बड़ी होती है, उसकी आवाज सबसे ऊंची होती है और अगर कोई उसे दबाने की कोशिश करे तो उसकी आवाज उठानी चाहिए. यह हमारा कर्तव्य है. उन्होंने कहा था कि राज्य सरकार का क्या मतलब है, हम सिर्फ पत्र लिखते रहते हैं. क्या एक ही व्यक्ति बोलता रहे और हम सिर्फ हां में हां मिलाते रहें. ऐसे में हम सभी को एक साथ खड़े होना चाहिए. हालांकि, उद्धव ठाकरे की यह बात भी रंग नहीं ला सकी है.

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