राजनीति

राज्यसभा उपसभापति के चुनाव में DMK पर दांव क्यों खेल रही है कांग्रेस?

 
नई दिल्ली 

राज्यसभा उपसभापति के चुनाव में कांग्रेस संयुक्त विपक्ष के रूप में डीएमके सांसद को मैदान में उतारने की रणनीति बना रही है. कांग्रेस ने सहयोगी और समान विचारधारा वाले विपक्षी दलों के साथ बातचीत कर सहमति बनाने की कवायद भी शुरू कर दी है. कांग्रेस ऐसे ही डीएमके पर सियासी दांव नहीं खेल रही है बल्कि एक सोची समझी रणनीति के तहत के तहत फैसला लिया है. 

संसद का मॉनसून सत्र 14 अक्टूबर से शुरू हो रहा है. राज्यसभा के उपसभापति रहे हरिवंश नारायण सिंह का कार्यकाल इसी साल अप्रैल में खत्म हो चुका है, जिसके बाद अब दोबारा से चुनकर आए हैं. ऐसे में उपसभापति का चुनाव दोबारा से होना है. एनडीए की ओर से एक बार फिर हरिवंश सिंह उपसभापति के लिए मैदान में उतरे हैं. उन्होंने अपना नामांकन दाखिल कर दिया है. ऐसे में कांग्रेस ने भी डीएमके के जरिए विपक्षी दलों को एकजुट करने की रणनीति अपनाई है. 

बता दें कि अगस्त, 2018 में कांग्रेस नेता पीजे कुरियन का कार्यकाल खत्म होने के बाद जेडीयू सांसद हरिवंश उपसभापति बने थे. हरिवंश के खिलाफ कांग्रेस ने बीके हरि प्रसाद को मैदान में उतारा था. हरिवंश को 125 वोट थे, जबकि कांग्रेस उम्मीदवार को 105 वोट ही मिल सके थे. एआईएडीएमके, बीजेडी और टीआरएस के एनडीए के पक्ष में खड़े हो जाने से कांग्रेस की जीत का समीकरण पूरी तरह से गड़बड़ा गया था. इस तरह से कांग्रेस की हार में दक्षिण भारत के छत्रपों की अहम भूमिका रही थी. 

राज्यसभा उपसभापति पद का चुनाव मॉनसून सत्र के पहले दिन 14 सितंबर को होगा. नामांकन दाखिल करने की आखिरी तारीख 11 सितंबर है. ऐसे में कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी के नेतृत्व में हुई बैठक में पार्टी ने उपसभापति के लिए अपना प्रत्याशी उतारने के बजाय डीएमके सांसद को लड़ाने की रणनीति बनाई है. कांग्रेस के कैंडिडेट होने से एआईएडीएमके, बीजेडी, टीआरएस और वाईएसआर जैसे दल एनडीए के साथ खड़े हो सकते हैं. ऐसे में डीएमके प्रत्याशी होने से इन दलों का समर्थन जुटाने की रणनीति है. 

कांग्रेस ने डीएमके के सांसद का नाम आगे बढ़ाकर यह संदेश दे दिया है कि एनडीए की राह पिछली बार की तरह आसान नहीं रहने वाली है. मौजूदा समय में एनडीए और यूपीए दोनों के पास सदन में बहुमत से कम संख्या थी. ऐसे में उन दलों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई जो एनडीए और यूपीए में से किसी भी खेमे में नहीं हैं.  

कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए समर्थक दलों के पास 90 राज्यसभा सांसद हैं. वहीं, सपा, बसपा, आम आदमी पार्टी, वाईएसआर कांग्रेस, टीआरएस और बीजेडी जैसे विपक्षी दल कांग्रेस से दूरी बनाए हुए हैं. हालांकि, डीएमके अगर इन विपक्षी दलों के समर्थन जुटाने में कामयाब रहता है तो एनडीए प्रत्याशी की राह मुश्किलों भरी हो जाएगी. इतना ही नहीं डीएमके तमिल अस्मिता के नाम पर एआईएडीएमके को भी कशकमश में डाल सकती है.  

हालांकि, कांग्रेस की यह लड़ाई भले ही देखने में प्रतीकात्मक लग रही हो और विपक्ष के पास एनडीए उम्मीदवार को हराने के लिए संख्या न दिख रही हो. इसके बावजूद कांग्रेस नेतृत्व एनडीए उम्मीदवार को निर्विरोध नहीं होने देना चाहती. इतना ही नहीं कांग्रेस मानसून सत्र से पहले विपक्षी दलों को एकजुट कर अपनी राजनीतिक ताकत का एहसास भी कराकर बड़ा संदेश देना चाहती है.