राजनीति

सचिन पायलट को अशोक गहलोत ने  हाशिए पर रखा, राजस्थान में मुद्दों को सुलझाने में नाकाम रही कांग्रेस

नई दिल्ली 
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और डिप्टी सीएम सचिन पायलट के बीच तनातनी के पीछे अभी तक केवल एक वजह सामने आई है। वो है, सरकार को अस्थिर करने की साजिश की जांच के लिए पुलिस द्वारा पायलट को 10 जुलाई को बुलाना। यहीं से राजस्थान की राजनीति में उथल-पुथल का दौर शुरू हो गया। एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता के अनुसार अपने उपमुख्यमंत्री के प्रति राजस्थान के सीएम का गहरा अविश्वास है और यही वजह है कि साल 2018 में बनी सरकार हाशिए पर खड़ी है। हालांकि, नोटिस तो अशोक गहलोत के पास भी गया है उन्हें भी अपना बयान दर्ज कराने के लिए कहा गया है, लेकिन पायलट के एक वफादर ने कहा कि उपमुख्यमंत्री को लगा कि वो जांच के निशाने पर हैं। राजस्थान में गहलोत की अगुवाई वाली सरकार के पिछले दो सालों के कार्यकाल में ऐसे कई मौके पर पायलट को नीचा दिखाने का काम किया गया है। लेकिन कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने चेतावनी के संकेतों की अनदेखी की। अंत में, पार्टी ने इस साल जनवरी में राजस्थान के लिए एक समन्वय समिति बनाई लेकिन उस पैनल ने अब तक सिर्फ एक बैठक की है।

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा भाजपा पर अपनी सरकार गिराने की कोशिश करने का आरोप लगाने के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने रविवार को कहा कि वह पार्टी को लेकर चिंतित हैं। सिब्बल ने इस 'संकट' से तुरंत निपटने की अपील करते हुए कहा कि पार्टी नेतृत्व कब 'जागेगा'? उन्होंने ट्वीट किया, 'पार्टी को लेकर चिंतित हूं। क्या हम तब जागेंगे जब हमारे हाथ से सब कुछ निकल जाएगा।' कांग्रेस पार्टी के राज्यसभा सदस्य विवेक तन्खा ने सिब्बल के ट्वीट पर कहा कि उनकी चिंता पार्टी के प्रत्येक सदस्य की चिंता है। तन्खा ने ट्वीट किया, 'कपिल जी आपकी चिंता पार्टी के हर सदस्य की चिंता है। यह समय उन ताकतों को हराने के लिए एकजुट होने का है, जिनका केवल एक ही एजेंडा है 'कांग्रेस और हमारे लोकतांत्रिक मूल्यों तथा संस्थानों को कमजोर करना।' वैसे भी राज्य में कांग्रेस की वापसी बिल्कुल सहज नहीं थी। पायलट, जिन्होंने दिल्ली में अपने परिवार को छोड़ा और फिर चुनाव में कांग्रेस के प्रचार अभियान की कमान संभाली लेकिन जब मुख्यमंत्री बनाने की बात आई तो जातिगत समीकरणों के आधार पर पायलट को कमान नहीं मिल पाई। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों ने कहा कि पिछले कुछ महीनों से अशोक गहलोत का खेमा राजस्थान में कांग्रेस के नेतृत्व को बदलने की मांग कर रहा है। 

आगामी पंचायत चुनाव को देखते हुए दिल्ली में लॉबिंग भी शुरू कर दी गई है। यहां तक की एक समय में जब राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष थे तो उन्होंने इस समस्या का हल निकालने का प्रयास किया और दोनों नेताओं से कई दौर की मुलाकात की लेकिन कांग्रेस की पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच असहजता की स्थिति देखने को मिली। इस साल की शुरुआत में, पायलट ने राज्य के कुछ क्षेत्रों में बिगड़ती कानून-व्यवस्था की स्थिति के बारे में चिंता व्यक्त की थी जिसे सीधे तौर पर गहलोत के खिलाफ टिप्पणी के रूप में देखा जाता है क्योंकि गृह मंत्रालय उन्हीं के पास है। कुछ महीने पहले, राज्यसभा चुनाव में भी दोनों के बीच तनाव बढ़ गया था। गहलोत ने राज्यसभा सीट के लिए कांग्रेस पार्टी के सचिव नीरज डांगी को मैदान में उतारा। पायलट एक बड़ा जाना-पहचाना नाम चाहते थे, लेकिन गहलोत अपनी पसंद पर डटे रहे। और फिर, चुनावों से पहले, गहलोत ने आरोप लगाया कि कांग्रेस विधायकों को लालच दिया जा रहा है, यह दर्शाता है कि पार्टी एक सीट खो सकती है। हालांकि परिणाम इसके उलट आए और कांग्रेस ने दोनों सीट जीत ली। जीत का श्रेय पाने वाले पायलट ने कहा कि पहले फैले किसी भी तरह के संदेह निराधार थे। कोटा में 107 बच्चों की मौत ने भी दोनों के बीच के अंतर को सामने ला दिया जिसमें पायलट ने कहा कि राज्य सरकार को ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए और अधिक प्रयास करने की जरूरत है। पिछले महीने, संजय गांधी की पुण्यतिथि मनाने के लिए पार्टी मुख्यालय में एक समारोह में, पायलट ने कहा कि राज्य में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने बड़ी मेहनत की है, ऐसे में उनको इसका रिवार्ड मिलना चाहिए।

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