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कोरोनाः WHO में होगी भारत की अग्नि परीक्षा

नई दिल्ली
भारत जल्द विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के एग्जिक्यूटिव बोर्ड की कुर्सी संभालने वाला है। भारत जहां फैसला लेने वाले सभी वैश्विक मंचों का सदस्य बनना चाह रहा था वहीं यह बड़ी जिम्मेदारी उसे कोरोना संकट के बीच मिल रही है। डब्ल्यूएचओ के निर्णय लेने वाली इकाई की जिम्मेदारी नई दिल्ली के लिए काफी चुनौतीपूर्ण होने जा रही है तब जब संयुक्त राष्ट्र की यह एजेंसी अमेरिका और चीन के जियोपॉलिटिकल लड़ाई का केंद्र बन गई है। उल्लेखनीय है कि अमेरिका ने डब्ल्यूएचओ पर आरोप लगाए हैं कि कोरोना वायरस से संबंधित इसके कदम चीन केंद्रित रहे हैं और वह उसका बचाव करता आया है। वहीं, चीन ने भी सोशल मीडिया पर अमेरिका के खिलाफ अभियान छेड़ रखा है।

भारत के लिए है बड़ा अवसर
डब्ल्यूएचओ जहां अपनी विश्वसनीयता बरकरार रखने के संकट से गुजर रहा है वैसे में भारत के लिए यह एक अवसर भी हो सकता है कि कैसे इसके नेतृत्व को मजबूत किया जाए। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन के कंसल्टेंट की भूमिका निभा चुके मोहम्मद जीशान कहते हैं कि भारत अपने ऐडवांस फार्माश्यूटिकल इंडस्ट्री का फायदा उठा सकता है और एक टेक्नोक्रैटिक भूमिका में आ सकता है।

जीशान कहते हैं कि इस सप्ताह पीएम मोदी ने देश के नाम संबोधन में फार्माश्यूटिकल की महात्वाकांक्षा को दर्शाया है। उन्होंने रातोंरात जरूरी मेडकल उपकरण बनाने के लिए इंडस्ट्री की सराहना की है। और इस महामारी को भारत के वैश्विक लीडर बनने का अवसर बताया। एक उभरती हुई बड़ी वैश्विक शक्ति के रूप में जहां भारत विश्व की सबसे बड़ी हेल्थ बॉडी की जिम्मेदारी निभाने जा रहा है, वहीं ऐसे में उसके लिए जियोपॉलिटिकल विवाद से बचना आसान नहीं होगा।

जियोपॉलिटकल चुनौती, कैसे निपटेगा भारत?
इसी सप्ताह अमेरिका ने ताइवान को डब्ल्यूएचओ में शामिल करने के प्रयास की पहल की है। विदेश मंत्री माइक पॉम्बियो ने सात देशों की बैठक बुलाई। इन सात देशों में ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, इजरायल, जापान और दक्षिण कोरिया के अलावा भारत भी शामिल था। लेकिन दो दिन के बाद ही भारत को चीन और रूस ने शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन की बैठक में आमंत्रित किया। इसका मकसद महामारी के खिलाफ किए जा रहे प्रयास पर चर्चा थी। उल्लेखनीय है कि चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है।

द डिप्लोमैट में प्रकाशित जीशान के स्तंभ के मुताबिक, भारत और चीन के मौजूदा संबंध की बात करें तो कोरोना वायरस से लड़ने को लेकर मंगाए गए मेडिकल उपकरण की खामियों पर भारत ने खुलकर बोला है और यहां तक कि ताइवान से मेडिकल उपकरण का भी इसे फायदा मिला है।

जीशान कहते हैं कि चीनी शक्तियों को रोकना भारत के अपने हित में है चाहे वह बॉर्डर के नजरिये से देखा जाए। चीन और पाकिस्तान मिलकर संयुक्त राष्ट्र में भारत के प्रयासों को रोकते रहे हैं। ये दोनों दक्षिण एशिया में भारत के प्रभुत्व को बढ़ाने के लक्ष्य के भी आड़े आते रहे हैं। वहीं, अमेरिका भी इस ताक में है कि वह कैसे भारत को बड़े राजनीतिक फैसले लेने के लिए मनाए।

भारत तीन साल तक डब्ल्यूएचओ का प्रतिनिधित्न करेगा और यह भारत के लिए अवसर है कि वह कैसे इस वैश्विक संगठन को मौजूदा संकट से बाहर निकाले। लेकिन भारत के लिए साथ ही जरूरी होगा कि वह अपनी आजादी, रुचि और विश्वसनीयता को बरकरार रखते हुए इस जिम्मेदारी को निभाए।

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