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महिला दिवस : रूढ़ियों को तोड़ने की चाहत ने शेरिंग लांडोल को बनाया पहली लद्दाखी महिला डॉक्टर, बेहद रोमांचक है कहानी

 नई दिल्ली 
International Women's Day 2020: वह जिस समाज में पली-बढ़ीं, उसमें अंधविश्वासों का बोलबाला था। परिवार की औरतों को भी गर्भवती स्त्री की मदद की इजाजत न थी, क्योंकि इससे देवता के नाराज होने का भय बताया जाता। इस कारण काफी स्त्रियां और शिशु दम तोड़ देते। शेरिंग को यह स्थिति मंजूर न थी।

दुनिया की सबसे खूबसूरत जगहों में से एक – लेह। कुदरत ने जैसे अपना सारा हुस्न यहीं आकर बिखेर दिया है। इसी जिले के एक किसान खानदान में 75 साल पहले शेरिंग पैदा हुईं। हालांकि इस परिवार के किसी सदस्य की औपचारिक शिक्षा से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था, लेकिन शेरिंग के लिए नियति ने कुछ और मकाम तय कर रखा था।

अगले दो साल में न सिर्फ हिन्दुस्तान एक ऐतिहासिक करवट लेने जा रहा था, बल्कि लेह-लद्दाख के लोगों की जिंदगी में भी एक नई रोशनी फूटने वाली थी। उम्मीदों से भरे उस दौर में शेरिंग के परिवार ने आने वाले वक्त में शिक्षा की अहमियत को जाना-समझा और बच्चों को स्कूल की तरफ मोड़ दिया। शेरिंग पढ़ने में काफी अच्छी थीं, इसलिए उन्हें घर-स्कूल से भरपूर सराहना मिलती। और इससे उनका हौसला मजबूत होता गया। 

मोरावियन मिशन स्कूल से प्राइमरी की पढ़ाई पूरी करने के बाद शेरिंग मैट्रिक की पढ़ाई के लिए लेह के गवर्नमेंट हाई स्कूल पहुंचीं। लेकिन उनके स्कूल में विज्ञान की पढ़ाई के लिए जरूरी संसाधनों की भारी कमी थी। अंग्रेजी वर्णमाला तो उन्हें छठे दरजे में पढ़ने को मिली। शेरिंग कहती हैं, ‘हमें शास्त्रीय तिब्बती, हिंदी और उर्दू की भी पढ़ाई करनी पड़ती थी। सारी किताबें तब उर्दू में होती थीं, लेकिन मैट्रिक के इम्तिहान के परचे इंग्लिश में होते। हमें काफी कठिनाई होती थी।’ 

शेरिंग जब छोटी थीं, उनके गांव में एक डॉक्टर आया करता था। उसके गले में लटकते स्टेथोस्कोप ने नन्ही शेरिंग पर जादू-सा कर दिया। डॉक्टर बनने के सपने ने तो तभी जन्म ले लिया था, लेकिन इसे उन्होंने मजबूत इरादा तब बनाया, जब वह होशमंद हुईं। वह जिस समाज में पली-बढ़ीं, उसमें अंधविश्वासों का साम्राज्य कायम था। प्रसव को लेकर कई तरह की रूढ़ियां प्रचलित थीं। परिवार की औरतों को भी दर्द से कराहती गर्भवती स्त्री की मदद करने की इजाजत न थी, क्योंकि इससे देवता के नाराज होने का भय बताया जाता। नतीजतन, बच्चा जनने के क्रम में काफी स्त्रियां और शिशु दम तोड़ देते थे।
 
शेरिंग को यह स्थिति मंजूर न थी। उनकी जेहनीयत ने श्रीनगर के गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज के दरवाजे उनके लिए खोल दिए। वहां से स्त्री रोग में विशेषज्ञता हासिल करने के बाद उन्होंने श्रीनगर में कुछ साल अनुभव हासिल किया और फिर 1979 में वह लेह स्थित सोनम नोरबू मेडिकल हॉस्पिटल से जुड़ गईं। अपने इलाके की वह पहली स्त्री रोग विशेषज्ञ थीं। जिस समाज में प्रसव के दौरान किसी अन्य औरत को मौजूद न रहने देने की प्रथा हो, उसके लिए यह एक अजूबा ही था। मगर शेरिंग को अपने पिता रिग्जिन नामग्याल का साथ हमेशा मिला। 
 
उन दिनों जिन परिस्थितियों में डॉक्टरों को लेह में ऑपरेशन करना पड़ता था, आज किसी को भी हैरानी हो सकती है। रक्त जमा देने वाले तापमान में प्रसव कराना पड़ता, बिजली नियमित रूप से नहीं आती थी। सर्दी के दिनों में तो लकड़ी की आग वाले चूल्हों का इस्तेमाल करना पड़ता, जो अपने प्रदूषण की वजह से जहरीले होते थे। 

यहां तक कि एनेस्थेसिया के इस्तेमाल में भी काफी कठिनाई आती, क्योंकि वे बेहद ज्वलनशील होते हैं और पास में लकड़ी का चूल्हा जल रहा होता था। चूंकि तापमान सामान्य बनाने की यह पद्धति हानिकारक थी, इसलिए शेरिंग ने कश्मीर के पारंपरिक हमाम सिस्टम का सहारा लिया और कुछ विदेशी गैर-सरकारी संस्थाओं की मदद से वह इसे अपने अस्पताल में लाने में कामयाब हो सकीं। हमाम कक्ष प्रसव व ऑपरेशन, दोनों में काम आने लगे। और कई सालों की मशक्कत के बाद सरकार ने उनके अस्पताल में ‘सेंट्रल हिटिंग सिस्टम’ लगाया।

सेहत के लिहाज से औरतों के रहन-सहन और खान-पान को लेकर काफी समस्याएं आती थीं। वहां इतनी सर्दी पड़ती है कि लोग बड़ी मुश्किल से स्नान करते हैं। उन दिनों कई लोग महीने में बमुश्किल एक बार नहाते थे। जाहिर है, औरतों की स्थिति अलग न थी, बल्कि वे खाना भी अक्सर बासी खातीं। गर्भवती औरतों को इस वजह से कई तरह की तकलीफें पैदा हो जाती थीं। फिर एक बड़ी समस्या यह थी कि औरतें यौन समस्याओं के बारे में किसी से चर्चा नहीं करती थीं, पर शेरिंग के आने से उन्हें बल मिला और वे आहिस्ता-आहिस्ता खुलने लगीं। 

चूंकि शेरिंग स्थानीय भाषा, लोगों की माली हालत समझ सकती थीं, इसलिए महिलाएं उनके पास आने लगीं। लद्दाख के सुदूर इलाकों में भी उन्होंने औरतों को स्वच्छता और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने के लिए शिविर लगाए। उनकी कोशिशों की बदौलत महिलाएं प्रसव के लिए सरकारी अस्पताल में आने लगीं। 1980 में उनके अस्पताल में जहां 114 बच्चों का जन्म हुआ था, वह 2004 में उनके अवकाश लेते समय 1,241 तक पहुंच चुका था। उनकी इस सेवा ने उन्हें भारी प्रतिष्ठा दिलाई है। अपनी मरीजों की पोतियों तक के प्रसव कराने वाली इस ममतामयी डॉक्टर को साल 2006 में भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया। इस साल उन्हें पद्म भूषण से नवाजा गया है।

प्रस्तुति :  चंद्रकांत सिंह

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