ग्वालियर

महापौरी मिली नहीं, मंत्रियों, विधायकों और पार्षदों में बेवजह हुआ बैर

ग्वालियर,

महापौरी का सपना आखिरकार कांग्रेस पार्षदों का चकानचूर हो गया। किसी को मनोनीत महापौर का सुख तो नहीं मिला, लेकिन दावेदारी जता रहे पार्षद और उनके नाम पर सहमति बनाने वाले विधायक और मंत्रियों में बैर जरूर हो गई। क्योंकि मंत्री व विधायक हाथ किसी के कंधे पर रखे हुए थे और वहीं किसी और के नाम की तरफ इशारा कर दिया। उल्लेखनीय है कि सरकार ने पहले शहर जिला कांग्रेस से महापौर मनोनीत करने के लिए नाम मांगें। पांच दावेदारों के नाम भोपाल पहुंचने के बाद कमलनाथ सरकार ने महापौर का मनोनयन करने की बजाए कोर्ट में शपथ-पत्र दे दिया कि 6 महीने के लिए महापौर का मनोनयन जरूरी नहीं है।

निर्वाचित महापौर विवेक नारायण ने सासंद निर्वाचित होने के बाद महापौर पद से इस्तीफ दे दिया। नगर निगम विधान के अनुसार अस्थाई महापौर मनोनयन का अधिकार प्रदेश सरकार को मिल गया। सरकार किसी भी निर्वाचित पार्षद महापौर मनोनीत कर सकती है। कांग्रेसी पार्षदों के महापौर मनोनीत बनने के सपनों को पंख लग गए। दावेदारों ने एड़ी चोटी का जोर लगा दिया। विधानसभा चुनाव से उत्साहित कांग्रेस का जोश लोकसभा चुनाव में ठंड़ा पड़ गया। कांग्रेस सदमे में चली गई। महापौर मनोनयन का मामला अधर में लटक गया।

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कोर्ट में दायर याचिका ने फिर उम्मीद जगाई

हाईकोर्ट की एकल पीठ में अस्थाई महापौर मनोनयन को लेकर दायर हुई याचिका ने एक बार फिर दावेदारों की उम्मीदों को फिर जगा दिया। कोर्ट के सरकार से जवाब मांगने पर सरकार ने शहर जिला कांग्रेस से सरकार ने महापौर मनोनयन के लिए नाम मांगें। पांच नामों का पैनल सरकार को भेज दिया। लेकिन सरकार ने एनवक्त पर कोर्ट में सरकार ने शपथ पत्र प्रस्तुत कर दिया कि 6 महीने के महापौर का मनोनयन जरूरी नहीं। इस शपथ-पत्र को पढ़कर दावेदार ठंड़े पड़ गए।

पैनल से मतभेद उभरे

महापौर मनोनयन के लिए मंत्री, विधायकों व संगठन में कद्दवार नेताओं ने अपना वजूद साबित करने के लिए अपने-अपने समर्थक को महापौर मनोनीत करने के लिए भोपाल से लेकर दिल्ली तक लॉबिंग शुरू कर दी। पांच सदस्यीय पैनल को फाइनल करने के बाद किस मंत्री, विधायक व नेता ने किस नाम के लिए दबाव बनाया, यह बात बाहर आने से इनके बीच मतभेद और बढ़ गए। इस कवायद से साफ हो गया कि राजनीति में कोई किसी का खास नहीं होता है। गोटियां अपने हित को देखकर चली जाती है। मंत्री, विधायक व नेता जिन कंधों पर हाथ रखे हुए थे। उनका नाम छोड़कर बंद कमने में किसी दूसरे का नाम आगे बढ़ा दिया। सबसे अधिक अघात ग्वालियर, पू्‌र्व व दक्षिण विधानसभा के नेताओं को पहुंचा है। नगर निगम चुनाव में इस बैर का खमियाजा कांग्रेस को उठाना पड़ सकता है।

 

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