राजनीति

उत्तर भारतीयों के प्रति नरम पड़े राज ठाकरे के तेवर

मुंबई । महाराष्ट्र में उत्तर भारतीय विरोध की राजनीति करने वाले राज ठाकरे के तेवर अब ढीले पड़ गए हैं। बीते 10 साल से उत्तर भारतीयों के खिलाफ जहर उगलने वाले राज ठाकरे इस बार खुलकर उत्तर भारतीयों के खिलाफ बोलने से बचते दिखाई दे रहे हैं। इस चुनाव में वह सिर्फ विपक्ष का नेता बनाने के लिए जरूरी सीट पाना चाहते हैं। राज ठाकरे ने अब तक महाराष्ट्र में तीन जनसभाएं की हैं लेकिन उन जनसभाओं में उत्तर भारतीयों को निशाना बनाने से परहेज किया है। मुंबई के घाटकोपर में एक जनसभा में उत्तर भारतीयों को कोसने के बाजय सिर्फ इतना कहा कि उत्तर भारत से रोज 48 ट्रेन आती हैं इससे भूमिपुत्र परेशानी झेल रहा है। लेकिन उन्होंने स्पष्ट तौर पर यूपी और बिहार के लोगों का नाम नहीं लिया और न ही उन्हें निशाने पर लिया। इस बार विधानसभा चुनाव में मनसे अध्यक्ष राज ठाकरे अपनी चुनावी रैलियों में जनता से यही कह रहे हैं कि मनसे को इतनी सीटों पर जिता दें जिससे कि विपक्ष के नेता पद उनकी पार्टी को मिल सके।
नहीं पूरी हुई गठबंधन की मुराद
विधानसभा चुनाव में राज ठाकरे कांग्रेस-एनसीपी के साथ गठबंधन कर अपनी राजनीतिक हैसियत में इजाफा करना चाहते थे लेकिन, कांग्रेस ने मुराद पूरी नहीं होने दी। हालांकि उन्होंने किसी तरह अकेले चुनाव मैदान में उतरने की हिम्मत जुटाई है लेकिन, राह आसान नहीं लग रही है। दरअसल, महाराष्ट्र की मराठी जनता भी भाषा या प्रांतवादी राजनीतिक विचारधारा की समर्थक नहीं रही है। सूबे की जनता यह मानती है कि भारत का संविधान महाराष्ट्र के ही सपूत बाबासाहेब डॉ भीमराव आंबेडकर ने लिखा है जिन्होंने देश के हर नागरिक को देश मे कहीं भी रहने और रोजगार प्राप्त करने का अधिकार दिया है। इसलिए खासकर महाराष्ट्र की दलित जनता जो डॉ आंबेडकर को भगवान मानती है वह राज ठाकरे के इस नकारात्मक सोच की विरोधी है। इसलिए साल 2009 में एक बार राज ठाकरे को मराठी मुद्दे का लाभ मिला लेकिन, उसके बाद जनता ने उन्हें तवज्जो नहीं दी।.
बाल ठाकरे ने भी छोड़ दिया था मराठी मुद्दा
दिवंगत शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने भी मराठी मुद्दा छेड़ा था लेकिन एक समय के बाद ठाकरे ने भी हिंदुत्व की विचारधारा को आत्मसात कर अपनी राजनीति को नया मोड़ दे दिया था। उन्होंने मुंबई में मद्रासियों के खिलाफ आंदोलन छेड़ा लेकिन, जल्द ही हिंदुत्व की राजनीति करने लगे। साल 1984 के सिख दंगे में बाल ठाकरे ने मुंबई में सिखों पर आंच नहीं आने दी। वहीं से 1993 के बाबरी विध्वंस के बाद मुंबई में हुए दंगे में बाल ठाकरे ने हिंदुत्व का खुलकर समर्थन किया।

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