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ट्रेन-18 प्रोजेक्ट विवादों में घिरा, धीमी पड़ी गति?

नई दिल्ली । भारत सरकार की महात्वाकांक्षी योजना ट्रेन-18 के अंतर्गत तैयार दूसरी वंदे भारत ट्रेन (दिल्ली से कटड़ा) 3 अक्टूबर से शुरू हो जाएगी। अब खबर आ रही है कि यह प्रोजेक्ट कई कारणों के चलते विवादों से घिर गया है और इसकी गति भी धीमी पड़ गई है। कुछ तकनीकी खामियों और रेलवे के इलेक्ट्रिकल और मकैनिकल विभाग के बीच विवाद से तीसरी ट्रेन-18 पर अभी तक काम शुरू नहीं हो सका है। मंत्रालय ने इसकी डिजाइनिंग से लेकर मैन्युफैक्चरिंग का काम करने वाली चेन्नई की इंटीग्रल कोच फैक्टरी (आईसीएफ) को वित्त वर्ष 2018-19 में ऐसी चार और ट्रेनें तैयार करने का आदेश दिया था। इससे पहले कि नई ट्रेनों पर काम शुरू हो, रेलवे ने मार्च में आईसीएफ को इस प्रोजेक्ट के सभी काम रोकने और संबंधित दस्तावेजों को रायबरेली फैक्टरी भेजने का आदेश दे डाला। तब से इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट की रफ्तार धीमी पड़ने लगी। रायबरेली फैक्टरी भेजने के फैसले के विरोध में 12 मजदूर संघों ने चेन्नई प्लांट के सामने विरोध किया। उनका कहना था कि ट्रेन-18 की तकनीक आईसीएफ की इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी है। उन्होंने रेलवे बोर्ड से मुलाकात कर ट्रेन-18 प्रोजेक्ट को कम से कम तीन साल के लिए आईसीएफ के पास रहने देने का आग्रह किया। यूनियनों के प्रतिनिधित्व ने कहा कि उनके आग्रह को मानते हुए इंडियन रेलवे के रोलिंग स्टॉक के सदस्य राजेश अग्रवाल ने उन्हें आश्वासन दिया है कि वित्त वर्ष 2019-20 के लिए 50 ट्रेनों का ऑर्डर आईसीएफ को दिया जाएगा। अभी यह विवाद खत्म हुआ नहीं था कि रेलवे के मकैनिकल और इलेक्ट्रिकल विभाग के अधिकारियों के बीच खींचतान की खबरें आने लगीं।
पिछले छह महीनों में पहले 43 ट्रेनों-18 के प्रॉपल्सन सिस्टम के लिए बोली मंगाई गई थी। इसमें से सिर्फ तीन ट्रेनों के लिए ही बोली को मंजूरी दी गई। ये टेंडर एक विदेशी फर्म सीएएफ और अन्य दो भारतीय कंपनी मेधा ग्रुप को मिले थे। मेधा ग्रुप ने पहली ट्रेन 18 में भी प्रॉपल्सन सिस्टम की सप्लाई की थी। इसी बीच पहली ट्रेन-18 बनाने वाले चेन्नई के आईसीएफ प्लांट पर आरोप लगा कि इस ट्रेन का टेंडर जारी करने में एक फर्म विशेष को फायदा पहुंचाया गया है। साथ ही, रिसर्च डिजाइन एंड स्टैंडर्ड ऑर्गनाइजेशन (आरडीएसओ) की ओर से तय सुरक्षा मानकों की अनदेखी भी की गई है। मंत्रालय ने इन गड़बड़ियों को जांचने के लिए एक विजिलेंस कमेटी बनाई थी, जिसने इन आरोपों को सही पाया। इसके बाद सरकार ने पहली बोली के सभी टेंडर को रद्द कर दिए गए।

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