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कई कंपनियों को योजना बदलने पर मजबूर कर सकती है आरबीआई की ओडीआई पर राय  

 मुंबई । रिजर्व बैंक आफ इंडिया (आरबीआई) की एक राय कई कंपनियों को ओवरसीज डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (ओडीआई) से जुड़ी अपनी योजना बदलने पर मजबूर कर सकती है। जबकि, कुछ कंपनियों को योजना छोड़नी भी पड़ सकती है। ओडीआई पर आरबीआई ने कुछ महीने पहले 'सर्वाधिक पूछे जाने वाले सवालों' का एक सेट जारी किया था। इसके अनुसार, कोई भी भारतीय कंपनी ऐसी किसी विदेशी कंपनी में हिस्सेदारी नहीं ले सकती है, जिसका किसी भारतीय इकाई में निवेश हो। यह बात तब भी लागू होगी, जब कोई भारतीय कंपनी किसी विदेशी कंपनी में ठीकठाक हिस्सा खरीदे और उस विदेशी कंपनी का किसी अन्य भारतीय कंपनी में अल्प हिस्सेदारी हो।
इस नियम का मकसद फंड की राउंड ट्रिपिंग पर लगाम कसना और विदेश में लिए गए सस्ते कर्ज को फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट के रूप में भारत लाने से रोकना है, लेकिन यह नियम वाजिब ओडीआई पर भी असर डाल सकता है। यह आरबीआई का अघोषित रुख रहा है, लेकिन पहली बार उसने इसे लिखित तौर पर सामने रखा है। आरबीआई के अनुसार रेजिडेंट्स को फॉरन सिक्यॉरिटी ट्रांसफर या इश्यू करने से जुड़े प्रावधान किसी भी भारतीय पक्ष को अपने पूर्ण स्वामित्व वाली विदेशी सब्सिडियरी या जेवी के जरिए इंडियन सब्सिडियरी स्थापित करने की इजाजत नहीं देते हैं। ये प्रावधान इंडियन पार्टी को पूर्ण स्वामित्व वाली ऐसी सब्सिडियरी खरीदने या ऐसे जेवी में निवेश करने की भी इजाजत नहीं देते हैं, जिसका पहले ही भारत में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निवेश हो। 
एक शेयर होल्ड करने को भी जेवी माना जाता है। इन हालात में ऑटोमैटिक ओडीआई रूट के जरिए किसी विदेशी कंपनी में एक या दो प्रतिशत शेयर खरीदने वाली भारतीय कंपनी को भी यह पक्के तौर पर देखना होगा कि विदेशी कंपनी का किसी दूसरी भारतीय इकाई में न तो स्टेक हो और न ही वह ऐसी इकाई में निवेश करे, भले ही वह दूसरे बिजनस ग्रुप की हो। लॉ फर्म एल एंड एल पार्टनर्स के पार्टनर संदीप डुडेजा ने कहा कि आरबीआई ने इस क्लैरिफिकेशन के जरिए कुछ विदेशी स्ट्रक्चर्स पर लगाम कसने की कोशिश की है, जो मुख्यतौर पर इंडियन ऐसेट्स होल्ड करने और टैक्स सिस्टम से फायदा लेने के लिए बनाए जाते हैं, लेकिन एफएक्यू की शब्दावली अपने आप में दुविधा पैदा करती है। उन्होंने कहा राउंड ट्रिपिंग पर काबू पाने की कोशिश में दुर्भाग्य से आरबीआई ने अनजाने में कई मौजूदा वैध कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर्स पर सवाल उठा दिया है। साथ ही, इसे कानून में बदलाव न कहकर एफएक्यू के रूप में पेशकर आरबीआई ने पिछले ट्रांजैक्शंस को सवालों के घेरे में ला दिया है।

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